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मुंबई: रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा, डॉलर के मुकाबले 93.94 तक गिरावट से बाजार में हलचल

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कच्चे तेल की महंगाई, मजबूत डॉलर और विदेशी निवेशकों की बिकवाली से दबाव; शेयर बाजार की कमजोरी ने बढ़ाई चिंता

मुंबई: भारतीय मुद्रा बाजार में सोमवार की शुरुआत ही भारी दबाव के साथ हुई और रुपया एक बार फिर इतिहास के सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच गया। वैश्विक हालात, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली के चलते रुपये में तेज गिरावट दर्ज की गई। शुरुआती कारोबार में ही रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 41 पैसे टूटकर 93.94 के स्तर पर पहुंच गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है।

इंटरबैंक फॉरेक्स मार्केट में दिन की शुरुआत में रुपया 93.84 के स्तर पर खुला, लेकिन कुछ ही समय में इसमें और कमजोरी आ गई और यह 93.94 तक फिसल गया। इससे पहले पिछले कारोबारी सत्र में भी रुपया भारी गिरावट के साथ बंद हुआ था और पहली बार 93 के पार गया था। लगातार दूसरे दिन आई इस गिरावट ने बाजार में चिंता बढ़ा दी है।

मुद्रा बाजार के जानकारों का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। इस क्षेत्र में चल रहे संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी बनी हुई है, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ गया है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतों में हर उछाल रुपये पर दबाव बनाता है।

वैश्विक स्तर पर Brent Crude की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं और यह 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है। तेल की महंगाई के कारण भारतीय कंपनियों और तेल विपणन कंपनियों को अधिक डॉलर की जरूरत पड़ रही है, जिससे विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ी है और रुपये पर दबाव और गहरा गया है।

इसके अलावा डॉलर की मजबूती भी रुपये की कमजोरी का एक बड़ा कारण बन रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर लगातार मजबूत हो रहा है, जिससे अन्य मुद्राओं के मुकाबले रुपया कमजोर पड़ रहा है। डॉलर इंडेक्स में बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि निवेशक सुरक्षित निवेश के तौर पर अमेरिकी मुद्रा की ओर रुख कर रहे हैं।

मुद्रा बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से पैसा निकालना भी रुपये के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। हाल के दिनों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने बड़े पैमाने पर भारतीय शेयर बाजार से पूंजी निकाली है। एक्सचेंज के आंकड़ों के अनुसार, एक ही दिन में हजारों करोड़ रुपये के शेयर बेचे गए, जिससे बाजार में अस्थिरता बढ़ी और रुपये पर दबाव आया।

शेयर बाजार में कमजोरी का असर भी सीधे तौर पर मुद्रा बाजार पर पड़ा है। जब इक्विटी बाजार में गिरावट आती है, तो विदेशी निवेशक जोखिम कम करने के लिए निवेश निकालने लगते हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है। यही स्थिति फिलहाल देखने को मिल रही है।

इस बीच भारतीय रिजर्व बैंक की भूमिका को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि केंद्रीय बैंक समय-समय पर हस्तक्षेप करता रहा है, लेकिन इस बार उसने रुपये को बाजार की स्थिति के अनुसार गिरने दिया है। हालांकि, अगर गिरावट इसी तरह जारी रहती है, तो आने वाले दिनों में RBI सक्रिय रूप से हस्तक्षेप कर सकता है।

ट्रेजरी विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में डॉलर की मांग काफी ज्यादा बनी हुई है, खासकर तेल कंपनियों और आयातकों की ओर से। यही वजह है कि रुपये को संभालना मुश्किल हो रहा है। जब तक वैश्विक स्तर पर हालात स्थिर नहीं होते और तेल की कीमतों में कमी नहीं आती, तब तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है।

इसी बीच देश के विदेशी मुद्रा भंडार में भी गिरावट दर्ज की गई है। हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार एक सप्ताह में कई अरब डॉलर घट गया है। विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट भी रुपये की स्थिरता को प्रभावित करती है, क्योंकि इससे बाजार में विश्वास कम हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा स्थिति कई कारकों का परिणाम है—कच्चे तेल की महंगाई, वैश्विक अनिश्चितता, डॉलर की मजबूती, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और घरेलू शेयर बाजार की कमजोरी। इन सभी कारकों ने मिलकर रुपये को ऐतिहासिक निचले स्तर तक पहुंचा दिया है।

आने वाले दिनों में रुपये की दिशा काफी हद तक वैश्विक बाजार के रुख पर निर्भर करेगी। यदि पश्चिम एशिया

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